आस्था का अनोखा केंद्र: उत्तराखंड का पांचवां धाम क्यों है खास?
अल्मोड़ा। देवभूमि उत्तराखंड का विश्वप्रसिद्ध जागेश्वर धाम सावन के पवित्र महीने का आगाज होते ही देश-विदेश से आने वाले शिवभक्तों की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र बन गया है। अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से करीब 36 किलोमीटर की दूरी पर ऊंचे और घने देवदार के जंगलों के बीचों-बीच स्थित यह अलौकिक मंदिर समूह समूचे उत्तराखंड का सबसे विशाल मंदिर परिसर होने का गौरव रखता है। इस पावन धाम में लगभग 125 छोटे-बड़े प्राचीन मंदिरों का अद्भुत समागम है, जिसे सनातन धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार ‘उत्तराखंड का पांचवां धाम’ भी स्वीकार किया जाता है, जहां प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु नतमस्तक होने पहुंचते हैं।
दारुक वन और ज्योतिर्लिंग की पौराणिक मान्यताएं
पौराणिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराण और शिव पुराण में इस अलौकिक स्थान को ‘नागेशं दारुकावने’ के पावन नाम से संबोधित और महिमामंडित किया गया है। सनातन मान्यताओं के अनुसार, यह पवित्र क्षेत्र स्वयं देवाधिदेव महादेव भगवान शिव और महान सप्तऋषियों की मुख्य तपस्या स्थली रही है। देश भर से आने वाले श्रद्धालु इस पावन विग्रह को भगवान शिव के बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में वर्णित नागेश यानी योगेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजते हैं। इसी विशेष धार्मिक महत्व के चलते यहां पूरे वर्ष रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप, कालसर्प दोष निवारण और विशेष पार्थिव पूजन जैसे अनुष्ठान पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न कराए जाते हैं।
सावन मास में उमड़ने वाला आस्था का जनसैलाब
सावन के महीने में इस पौराणिक धाम की छटा देखते ही बनती है, जब सुबह की पहली किरण के साथ ही पूरा परिसर ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठता है। रिमझिम बारिश और देवदार के पेड़ों से छनकर आती ठंडी हवाओं के बीच भक्तगण लंबी कतारों में लगकर शिवलिंग के दर्शन के लिए अपनी बारी का इंतजार करते हैं। स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन समिति द्वारा सावन के विशेष पर्व को देखते हुए श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुगम दर्शन और ठहरने के व्यापक प्रबंध किए गए हैं ताकि दूर-दराज से आने वाले यात्रियों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
वास्तुकला और स्थापत्य कला का बेजोड़ उदाहरण
प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज़ होने के साथ-साथ जागेश्वर धाम प्राचीन भारतीय वास्तुकला और केदारनाथ शैली के स्थापत्य का एक बेहद नायाब और जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। पत्थरों को काटकर बनाए गए इन गगनचुंबी मंदिरों की नक्काशी और प्राचीन शिलालेख इतिहास प्रेमियों और पुरातत्वविदों को भी अपनी ओर समान रूप से आकर्षित करते हैं। यह पावन परिसर न केवल आध्यात्मिक शांति का अहसास कराता है, बल्कि भारत की सदियों पुरानी सांस्कृतिक और विधायी विरासत को भी अपने भीतर पूरी भव्यता के साथ समेटे हुए है।
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