देहरादून| उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व (आरटीआर) के पश्चिमी छोर में बाघों के कुनबे को बढ़ाने और उनके संरक्षण के लिए एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। इस बार कार्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) से पांच नए बाघों को राजाजी लाने की योजना में बड़ा रणनीतिक बदलाव किया गया है। पिछली बार की तरह इस बार बाघों को लाने में लंबा इंतजार नहीं करना होगा, बल्कि कुछ ही समय के अंतराल पर इन सभी पांचों बाघों को शिफ्ट कर दिया जाएगा। इसी बीच, राजस्थान के अलवर में आयोजित एक उच्च स्तरीय कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 'रिइंट्रोडक्शन एंड पापुलेशन रिकवरी ऑफ टाइगर इन इंडिया' रिपोर्ट जारी की है, जिसमें राजाजी टाइगर रिजर्व के इस विस्थापन (ट्रांसलोकेशन) अभियान को देश के लिए एक अनुकरणीय और बेहतरीन कदम बताया गया है।

लंबा अंतराल नहीं, 1 से 2 साल में शिफ्ट होंगे सभी बाघ

राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी हिस्से में बाघों का अस्तित्व संकट में आ गया था और वहां इनकी संख्या बेहद कम बची थी। इस विषम परिस्थिति को सुधारने के लिए प्रशासन ने एक विशेष अभियान शुरू किया था, जिसके तहत साल 2020 से 2025 के बीच पांच बाघों को यहाँ सफलतापूर्वक बसाया गया। हालांकि, उस दौरान औसतन हर साल केवल एक ही बाघ को ट्रांसलोकेट किया जा सका था, जिससे कुनबा बढ़ने की रफ्तार काफी धीमी रही।

राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक कोको रोसे ने नई रणनीति का खुलासा करते हुए बताया कि इस बार सीटीआर (कार्बेट) से जो पांच नए बाघ लाए जाने हैं, उन्हें लंबे समय तक अटकाने के बजाय महज एक से दो साल के भीतर ही राजाजी टाइगर रिजर्व के जंगलों में पूरी तरह छोड़ दिया जाएगा। इससे बाघों को नए परिवेश में ढलने और अपनी आबादी बढ़ाने में काफी मदद मिलेगी।

राष्ट्रीय रिपोर्ट में राजाजी मॉडल की सराहना

केंद्रीय मंत्री द्वारा जारी की गई आधिकारिक रिपोर्ट में राजाजी टाइगर रिजर्व को देश में बाघों की आबादी की बहाली (पापुलेशन रिकवरी) का एक उत्कृष्ट और सफल उदाहरण माना गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक समय ऐसा था जब राजाजी के पश्चिमी खंड में महज दो बूढ़ी बाघिनें ही शेष रह गई थीं। उस गंभीर संकट से उबरने के लिए कार्बेट से बाघों को यहाँ स्थानांतरित करने का साहसिक फैसला लिया गया, जिसके अब सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। यह प्रोजेक्ट यह साबित करता है कि जिन जंगलों में प्राकृतिक रूप से बाघ दोबारा नहीं लौट पाते, वहां वैज्ञानिक पद्धति से बाहर से बाघों को लाकर बसाना पूरी तरह से उपयोगी और गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

NTCA और WII ने तैयार किया बाघ संरक्षण का भविष्य का रोडमैप

अलवर के इसी आयोजन में केंद्रीय वन मंत्री ने 'रोडमैप फॉर एक्टिव मैनेजमेंट ऑफ टाइगर इन इंडिया रिपोर्ट-2026' भी देश के सामने रखी। इस दूरदर्शी विजन डॉक्यूमेंट को देश में बाघों की लगातार बढ़ती तादाद और उनके रहने के ठिकानों के प्रबंधन को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें इस बात का पूरा खाका खींचा गया है कि देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बाघों को कैसे सुरक्षित और संरक्षित रखा जाए।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. बिलाल ने रिपोर्ट के तकनीकी पहलुओं की जानकारी देते हुए बताया कि आने वाले दिनों में देश के भीतर बाघ संरक्षण के कार्य को किस दिशा में ले जाना है, इसकी पूरी गाइडलाइन तैयार कर ली गई है। इसके तहत:

  • वास स्थल (हैबिटाट) का सुधार: बाघों के छिपने, शिकार करने और पानी के प्राकृतिक स्रोतों को बेहतर बनाया जाएगा।

  • कॉरिडोर का संरक्षण: एक जंगल से दूसरे जंगल के बीच बाघों के आने-जाने वाले रास्तों को सुरक्षित किया जाएगा।

  • जन सहभागिता: जंगलों के आसपास रहने वाले स्थानीय ग्रामीणों को वन्यजीव संरक्षण से जोड़ा जाएगा, ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष (मैन-एनिमल कॉन्फ्लिक्ट) को कम किया जा सके।

जंगलों को समृद्ध करने और पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को मजबूत करने की दिशा में राजाजी का यह आगामी प्रोजेक्ट आने वाले दिनों में देश के वन्यजीव इतिहास में एक नया अध्याय लिखेगा।