अल्मोड़ा: रेगिस्तान के जहाज कहे जाने वाले दो ऊंटों, राजू और मोती, के जीवन में आखिरकार नौ साल के लंबे इंतजार के बाद आजादी की नई सुबह आई है। मरुस्थल की तपती रेत से निकलकर तराई और भाबर के मैदानी इलाकों में बंधक जैसी जिंदगी काट रहे इन बेजुबानों को पहाड़ की वादियों में आकर पिंजरे से मुक्ति मिली। पशु सुरक्षा सेवा समिति ने एक सराहनीय कदम उठाते हुए अल्मोड़ा में आयोजित कुमाऊं महोत्सव से इन दोनों ऊंटों को सफलतापूर्वक रेस्क्यू किया। रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा होने के बाद रविवार को दोनों को उनके अनुकूल और प्राकृतिक पर्यावास में वापस भेजने के लिए राजस्थान के जयपुर रवाना कर दिया गया, जिससे इन बेजुबानों की आंखों में अपने घर लौटने की खुशी साफ देखी जा सकती थी।

महोत्सव में मनोरंजन के नाम पर हो रहा था बेजुबानों का व्यापारिक इस्तेमाल

इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन की कहानी तब शुरू हुई जब बीते 22 जून को रामनगर के ढिकुली का रहने वाला शाहिद अंसारी नाम का एक व्यक्ति इन दोनों नौ वर्षीय ऊंटों को लेकर अल्मोड़ा के कुमाऊं महोत्सव में पहुंचा था। वह स्थानीय जीआईसी मैदान में चल रहे इस मेले में आने वाले लोगों और बच्चों को ऊंट की पीठ पर सवारी कराकर अवैध रूप से पैसे कमाने का धंधा कर रहा था। पथरीले और पहाड़ी रास्तों पर भारी वजन ढोने और सवारी करने की वजह से ये बेजुबान जानवर काफी थके हुए और प्रताड़ित महसूस कर रहे थे।

पशु सुरक्षा समिति ने कानून का हवाला देकर रुकवाया क्रूरता का खेल

जैसे ही इस व्यावसायिक गतिविधि की भनक पशु सुरक्षा सेवा समिति के पदाधिकारियों को लगी, वे तुरंत एक्शन में आ गए और अपनी टीम के साथ जीआईसी मैदान में चल रहे महोत्सव स्थल पर धावा बोल दिया। समिति के सदस्यों ने मौके पर पहुंचकर स्पष्ट किया कि उत्तराखंड के पहाड़ी और विषम भौगोलिक क्षेत्रों में ऊंटों का किसी भी तरह का व्यावसायिक या मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करना कानूनी रूप से पूरी तरह प्रतिबंधित है। उन्होंने ऊंट संचालक को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और पहाड़ों के कड़े नियम-कानूनों का हवाला दिया, जिसके बाद संचालक को अपनी गलती माननी पड़ी और प्रशासन के सहयोग से दोनों ऊंटों को तुरंत मुक्त कराकर उनके असली घर जयपुर भेजने की मुकम्मल व्यवस्था की गई।