मजबूत गढ़ बचाने की कवायद, BJP ने चार सीटों पर बढ़ाई रणनीतिक निगरानी
देहरादून: राज्य के करीब छब्बीस वर्षों के राजनैतिक इतिहास का विश्लेषण करें तो कांग्रेस के दस साल के शासनकाल को छोड़कर लगभग सोलह वर्षों तक सत्ता की कमान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हाथों में रही है। वर्तमान में लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार चला रही भाजपा के सामने सूबे की चार ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां पार्टी की नीतियां और चुनावी समीकरण आज तक कभी कमल खिलाने में कामयाब नहीं हो पाए। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए सत्तारूढ़ दल ने इस बार बेहद शुरुआती दौर में ही इन कमजोर कड़ियों को मजबूत करने के लिए एक अभेद्य चक्रव्यूह तैयार कर लिया है।
वरिष्ठ नेताओं को सौंपी जिम्मेदारी, त्रिकोणीय मुकाबले पर भी पैनी नजर
पार्टी के रणनीतिकारों ने इन अजेय माने जाने वाले गढ़ों को भेदने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। संगठन ने इस विशेष अभियान के तहत जो रणनीति बनाई है, उसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
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दिग्गजों की तैनाती: प्रदेश कोर कमेटी के बेहद कद्दावर और अनुभवी सदस्यों को इन चारों विधानसभा क्षेत्रों में सीधे तौर पर तैनात कर दिया गया है। आगामी चुनाव संपन्न होने तक पूरे चुनावी प्रबंधन और रणनीति की बागडोर इन्हीं नेताओं के हाथों में रहेगी।
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सघन माइक्रो मैनेजमेंट: इस बार बेहद सूक्ष्म स्तर पर चुनावी मोर्चेबंदी की गई है। इसके अंतर्गत बूथ अध्यक्ष, मंडल प्रभारी, 'मन की बात' कार्यक्रम के समन्वयक, विभिन्न प्रकोष्ठों और मोर्चा के प्रमुख पदाधिकारियों को एक सूत्र में पिरोया गया है।
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हर मतदाता तक पहुंच: इस विशेष रणनीति का मुख्य ध्येय बूथ स्तर के एक-एक जमीनी कार्यकर्ता को सक्रिय करके क्षेत्र के हर एक वोटर तक सीधे पहुंच स्थापित करना है।
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मुख्यालय से सीधी निगरानी: इन चारों विधानसभा क्षेत्रों में होने वाली हर छोटी-बड़ी राजनैतिक गतिविधि पर केंद्रीय और प्रांतीय पार्टी मुख्यालय सीधे नजर रख रहा है।
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त्रिकोणीय समीकरणों पर नजर: जिन सीटों पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा कोई तीसरा क्षेत्रीय दल या निर्दलीय प्रत्याशी मजबूत स्थिति में है, वहां के समीकरणों का खास अध्ययन किया जा रहा है ताकि मुकाबले को त्रिकोणीय बनाकर विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण रोका जा सके।
ये हैं वे चार सीटें जहां भाजपा आज तक जीत का खाता नहीं खोल पाई
पार्टी संगठन इस बार चकराता, पिरान कलियर, मंगलौर और धारचूला में जीत दर्ज कर राज्य में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की अपनी खुशी को दोगुना करना चाहता है। इन सीटों का इतिहास इस प्रकार है:
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चकराता (देहरादून): वर्ष 2002 से लेकर 2022 तक हुए सभी पांचों विधानसभा चुनावों में इस सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रीतम सिंह का ही एकछत्र राज रहा है और वे लगातार विधायक चुने जाते रहे हैं।
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पिरान कलियर (हरिद्वार): नए परिसीमन के बाद वजूद में आई इस विधानसभा सीट पर साल 2012, 2017 और 2022 के लगातार तीन चुनावों में कांग्रेस के फुरकान अहमद ने अपनी जीत का परचम लहराया है।
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मंगलौर (हरिद्वार): राजनीतिक रूप से बेहद अस्थिर रही इस सीट पर शुरुआत के तीन चुनावों (2002, 2007, 2012) में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का कब्जा था। 2017 में यह कांग्रेस के खाते में गई। इसके बाद 2022 में फिर बसपा ने वापसी की, लेकिन 2024 में हुए उपचुनाव के बाद वर्तमान में यह सीट पुनः कांग्रेस के पास है।
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धारचूला (पिथौरागढ़): इस सीमांत क्षेत्र में वर्ष 2002 और 2007 के चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी गगन सिंह रजवार ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2012, 2017 और 2022 के आम चुनावों सहित 2014 के उपचुनाव में भी कांग्रेस के हरीश धामी विजयी रहे और भाजपा को हर बार शिकस्त झेलनी पड़ी।
इन तीन अन्य सीटों पर भी जीत को तरस रहा है संगठन
इन चार प्रमुख सीटों के अलावा राज्य में तीन ऐसी अन्य विधानसभा सीटें भी हैं, जहां भाजपा का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा है और पार्टी वहां दोबारा पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रही है:
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यमुनोत्री (उत्तरकाशी): साल 2002 और 2012 में यहां उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) का कब्जा रहा, जबकि 2007 में कांग्रेस और 2022 में निर्दलीय उम्मीदवार ने बाजी मारी। भाजपा को इस सीट पर केवल एक बार वर्ष 2017 में केदार सिंह रावत की बदौलत जीत नसीब हुई थी।
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भगवानपुर (हरिद्वार): साल 2002 में यहां से भाजपा के चंद्रशेखर जीते थे, लेकिन उसके बाद 2007 और 2012 में यह सीट बसपा के पाले में चली गई। पिछले दो चुनावों (2017 और 2022) से इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा बरकरार है।
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हल्द्वानी (नैनीताल): कुमाऊं मंडल की इस महत्वपूर्ण सीट पर 2002 में कांग्रेस जीती थी। हालांकि, 2007 में भाजपा के बंशीधर भगत यहां से विधायक बने, लेकिन उसके बाद 2012, 2017 और 2022 के चुनावों में लगातार यह सीट कांग्रेस के मजबूत गढ़ के रूप में स्थापित हो चुकी है।
सकारात्मक रुझान और आंतरिक सर्वे पर टिका है भरोसा
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और संगठन मंत्रियों का मानना है कि इन कमजोर सीटों को लेकर जमीनी स्तर पर बहुत पहले ही काम शुरू कर दिया गया था। स्थानीय स्तर पर जिताऊ चेहरों की पहचान करने के लिए कई दौर के आंतरिक सर्वे कराए जा रहे हैं और सभी जातीय व सामाजिक समीकरणों को बारीकी से परखा जा रहा है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में इन कभी न जीतने वाली सीटों पर भी जनता का रुझान इस बार पार्टी के प्रति काफी सकारात्मक और उत्साहजनक दिखाई दे रहा है। इसके बावजूद, संगठन किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है और आगामी चुनावों में इन सभी दुर्गम किलों पर फतह हासिल करने के लिए एक विशेष और बेहद गोपनीय कार्ययोजना के तहत काम किया जा रहा है।
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